बनारस- संस्कृति और आधुनिकता का मेल
दोस्तो मैं हूँ " सूरज जी आज बहुत समय बाद आपसे फिर अपने आर्टिकल के माध्यम से मिलना हुआ है।
आज ये आर्टिकल मैं बनारस के घाट पर बैठ कर लिख रहा हूँ।''
मुझे ये आर्टिकल लिखते हुए ऐसा महसूस होता है कि ये आर्टिकल मैं सिर्फ बनारस के घाट पर ही लिख सकता हूँ।
ऐसा इसलिय मैं बोल रहा हूँ कि आपको ये एहसास मैं शब्दो मे बयान नही कर सकता हूँ। आपको बनारस के घाट की खूबसूरती यहाँ आकर ही देखनी होगी। आपको यहाँ से जुड़ाव हो जायेगा। आप बनारस बार - बार आना चाहे।
मैं जब भी बनारस रहता हूँ। बनारस के घाटों की खूबसूरती देखने जरूर देखने जरूर आता हूँ। बहुत ही सुकून मिलता है मुझे।
घण्टो घाटो पर बैठ कर घाटो और उनकी गतिविधियों को बारीकी से निहारत हूँ।
घण्टो घाटो पर बैठ कर घाटो और उनकी गतिविधियों को बारीकी से निहारत हूँ।
मन को बहुत ही शन्ति मिलती है। और उस शांत मन से अपने साथ लाये उन कोरो पन्नो को भरता हूँ। दिल और दिमाग मे मची हलचल को शब्दों के माध्यम से पन्नो पर उतारने को मुझे विवश करता है।
और जो भी शब्द उन पन्नो पर उभरता है वह मेरे मन के शब्द है जो माँ गंगा के लहरो की तरह बहती है कल -कल करती हुई।
______________________________________________
क्या लिखूं अपने मन की।
क्या लिखूं अपने मन की।
शब्द नही मिलते है....
गंगा के लहरो सा मन हुआ है मेरा।
क्या लिखूं क्या छोड़ू अपने मन की।
समझ नही आता है मन मै क्या शोर सा है
समझ नही आता।
बहता रहे मन लहरों सा बैठा हूँ
निहारते सुंदर घाटो को...
क्या लिखूं अपने मन की शब्द नही मिलते ।
______________________________________________
हर ओर बनारस को प्रचीन से आधुनिक बनाने की होड़ सा है। बस डर इस बात का है कही हम अपने बनारस को कही खो तो नही रहे है। ये सोचने वाली बात है।
ये हम सब को सोचना होगा खास तौर पर बनारस वासियो को की हम कैसे बनारस देखना चाहते है।कही हम अपने बनारस के घाटो की खूबसूरती और शन्ति को खो न दे।
सोचना होगा..........
जय हिंद
जय भारतीय।
ये हम सब को सोचना होगा खास तौर पर बनारस वासियो को की हम कैसे बनारस देखना चाहते है।कही हम अपने बनारस के घाटो की खूबसूरती और शन्ति को खो न दे।
सोचना होगा..........
जय हिंद
जय भारतीय।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें